

संतोष तिवारी की रिपोर्ट
पुस्तकीय ज्ञान में प्रत्यक्ष अनुभव का संस्पर्श नहीं होता,केवल वस्तु या स्थान के बारे में हमारी एक अस्पष्ट और मोटी धारणा होती है और उसी धारणा के सहारे मानस प्राणायाम द्वारा हम जीवन भर काम चलाते है।साक्षात न होने पर पर्वत ,वन हमारे लिए कोश के निर्जीव शब्द मात्र होते है। धार्मिक स्थल,ऐतिहासिक स्थल हमारे लिए भूगोल या सामान्य ज्ञान के प्रश्न मात्र बनकर रह जाते है किंतु एकबार जिसने इसका साक्षात्कार किया,उसके समक्ष ये शब्द सत्य के साक्षात्कार होकर मृदुल,मोहक और सतर्क भावनाओं का संचार करते है।साहिबगंज जिला के बरहेट ब्रिटानिया सरकार की चूले हिला देने वाली ऐतिहासिक सिदो कान्हो के नेतृत्व में 1855 के संथाल विद्रोह के साथ साथ एक रहस्यमयी गुफा में विराजमान गजेश्वर नाथ का चमत्कारी शिवगादी धाम भी धार्मिक महत्व को अपने आगोश में समेटे हुए है। संथाल परगना का दूसरा बाबा धाम के रूप मे प्रसिद्ध बाबा गाजेशवर नाथ ” शिवगादी ” का दर्शनीय और पोराणिक पूज्यनीय मंदिर प्रकृतिक के क्रीडा स्थली राजमहल की पहाड़ीयो मे मनोरम दृश्यो एवं झर-झर गिरते झरने की नैसर्गिक सोन्दर्य के बिच एक गृहा गुफा मंदिर है। यह मंदिर झारखण्ड प्रान्त के सहेबगंज जिला अन्तर्गत बरहेट प्रखण्ड से 6 किमी की दूरी पर उत्तर की ओर अवस्थित है। बाबा गाजेशवर नाथ का यह मंदिर पहड़ी के ऊँचाई मे स्थित है श्रद्धलुऔ को 195 सीढ़ियों के चढ़ाई के पश्चात मंदिर का दर्शन होता है। शिवगादी धाम में बाबा गजेश्वर नाथ विराजते है जिस कारण गजेश्वर नाथ धाम से प्रसिद्ध है।यह पवित्र स्थल राजमहल के पहाड़ी श्रृंखलाओं घने जंगलों और प्राचीन चट्टानों के बीच स्थित एक प्राकृतिक गुफा में अवस्थित है, जहाँ भगवान शिव का शिवलिंग स्वयंभू रूप में मौजूद है, और उस पर गुफा की छत से जल की बूंदें भगवान शंकर को जलाभिषेक निरंतर करती रहती है। यह अद्भुत मनोरम दृश्य भक्तों को आह्लादित करती है।यह चमत्कारिक शिवगादी धाम आध्यात्मिक ,धार्मिक, शारीरिक,मानसिक ऊर्जा का अथाह समंदर बन जाता है। शिवगादी धाम की महिमा श्रावण मास के पावन अवसर पर भक्तों की आस्था आनंद की उतुंग शिखर पर पहुंचकर आनंदित होते हैं । सत्य का प्रकाश शिव की ज्योति से अनुप्राणित होकर सुंदरम की मनोहर अभिव्यक्ति करता है।शिव विश्वचेतना में निहित वह तत्व है,जो लोक मंगल की दिशा में उन्मुख करती है।मनुष्य को मनुष्य के हितार्थ उन्मुख करने की भावना ही शिव है ।इसलिए *शिवो भूत्वा शिवम् यजेत * शास्त्र में वर्णित है।इस मान्यता के साथ लाखों श्रद्धालु विभिन्न राज्यों से बरहेट के पवित्र धरती पर स्थित शिवगादी धाम में जलाभिषेक करने आते है ।इसी मान्यता है कि बाबा गजेश्वर नाथ सबकी मनोकामना पूर्ण करते है ,त्याग , तपस्या एवं आत्मा की पुकार से की गई प्रार्थना निष्फल नहीं जाती। यह गुफा धार्मिक महत्व के साथ साथ भौगोलिक महत्व भी है यह राजमहल की पहाड़ियों को गोंडवाना लैंड मना जाता है जिसपर भूकंप का असर नहीं होता । इसकी रमणीय प्राकृतिक सौंदर्यता , ऐतिहासिक पौराणिक कथा, और इसकी गूढ़ रहस्यमय अनुभूति अपने आंचल में समेटे हुए है।शिवगादी मंदिर एक ऐसा स्थान है जहाँ आस्था, चमत्कार, और प्रकृति तीनों का संगम है। *धार्मिक मान्यता*शिवपुराण में वर्णित है कि महिषासुर के पुत्र गजासुर ने यहाँ कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और इस प्राकृतिक गुफा में इस चमत्कारी शिवलिंग को स्थापित किया।बाद में जब गजासुर अहंकारी हो गया और तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा, तब भगवान शिव ने इसी पर्वत पर उसका संहार किया। मृत्यु से पूर्व गजासुर की स्तुति से प्रसन्न होकर शिवजी ने वरदान दिया कि यह शिवलिंग उसी के नाम पर ‘गाजेश्वर नाथ’ के रूप में जाना जाएगा। कथा के अनुसार, जब भगवान शिव नंदी पर सवार होकर गजासुर का वध कर रहे थे, तब नंदी के दो पैरों के निशान यहाँ की चट्टानों पर पड़ गए, जो आज भी ‘शिवगंगा’ के रूप में मौजूद है। गजासुर की स्मृति में शिवलिंग की स्थापनागजासुर के अंत के बाद, भगवान शिव ने उसकी तपस्या और भक्ति की स्मृति में वहीं पर एक पवित्र शिवलिंग की स्थापना की। उन्होंने घोषणा की कि यह स्थल युगों-युगों तक भक्तों के लिए एक तीर्थस्थल रहेगा, जहाँ आकर श्रद्धालु मोक्ष की प्राप्ति करेंगे। यही शिवलिंग आगे चलकर गजेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्थानीय निवासियों और संथाल जनजातियों के बीच यह मान्यता है कि यह लिंग स्वयंभू है, जिसकी छवि और ऊर्जा आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसे युगों पहले थी।*प्रकृति करती है जलाभिषेक* शिवगादी मंदिर की सबसे अद्भुत और रहस्यमयी बात यह है कि गुफा की छत से बिना किसी जलस्रोत के लगातार पानी की बूँदें शिवलिंग पर गिरती रहती हैं। न तो यहाँ कोई झरना है, न ही कोई पाइप या तालाब — फिर भी यह जलाभिषेक 24 घंटे निरंतर होता रहता है। भक्तों का मानना है कि यह चमत्कार स्वयं भगवान शिव की कृपा है, जहाँ प्रकृति स्वयं पूजारी बनकर महादेव की आराधना करती है। यह दृश्य हर श्रद्धालु को भक्ति और विस्मय से भर देता है।*श्रावण मास में उमड़ता है आस्था का जनसैलाब*शिवगादी मंदिर श्रावण मास और महाशिवरात्रि के समय विशेष रूप से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। भक्त जन पैदल यात्रा करके इस गुफा तक पहुँचते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यहाँ यह भी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से बाबा से मन्नत माँगता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। मंदिर परिसर में एक चट्टान है जिसमें नंदी बैल के पैरों के निशान दिखाई देते हैं, जिन्हें भगवान शिव के वाहन नंदी के पदचिन्ह माना जाता है। इसके अलावा मंदिर के प्रवेशद्वार पर एक अद्भुत अक्षय वट वृक्ष (बरगद का पेड़) भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह बोधगया के बाद भारत का दूसरा सबसे पवित्र वटवृक्ष है। *वर्तमान स्थिति और विकास* सूबे के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन जी का विधानसभा क्षेत्र में शिवगादी धाम स्थित है।इसके बिकास कार्य काफी द्रुतगति से हो रहा है।आकर्षक मुख्य द्वार,गुफा तक जाने के लिए पक्की सीढ़ियों का निर्माणरास्ते में प्रकाश व्यवस्था ,पीने के पानी, शौचालय और बैठने की सुविधामंदिर परिसर को आकर्षक और साफ़-सुथरा बनाया गया शिवगादी मंदिर साहिबगंज रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किमी दूर पर विराजमान है।बड़हरवा से बरहेट की दूरी 20किमी है। बरहेट से मंदिर की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। बरहेट तक बस, ऑटो या टैक्सी मिलती है, और वहाँ से कुछ दूरी पैदल या वाहन से पहाड़ी मार्ग से तय करनी होती है। पर्यटन की दृष्टि से शिवगादी शिवगादी केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि यह एक सुंदर प्राकृतिक पर्यटन स्थल भी है।छत से शिव लिंग को स्वत जलाभिषेक करती जलधारा,नंदी के पदचिह्न,अक्षय वट वृक्ष,वनों से आच्छादित पहाड़ी श्रृंखलाएं मन को स्वाभाविक रूप से आकृष्ट करता है। *श्रावण मास का विराट मेला*श्रावण मेला में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ता है विभिन्न राज्यों से गेरुवा वस्त्र धारण किए हुए रंग बिरंगे सजा धजा कांवड़ लेकर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है ।बोलबम के नारे से आकाश गुंजायमान हो जाता है। आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक वेशभूषा में भाव राग , ताल, लोकनृत्य से धार्मिक छटा को जीवंत बना देते हैं। यहाँ का मेला सभ्यता संस्कृति और परंपराओं का संगम बन जाता है।शिवगादी धाम को ‘ संथाल परगना के दूसरा बाबाधाम ‘ के नाम से भी जाना जाता है।




