
संतोष तिवारी की रिपोर्ट
राष्ट्र के लिए समर्पित डॉ शीश मोहम्मददेश हित का मूल्य प्राण है,देखो कौन चुकाता है।कौन सुमन शैय्या तज कंटक पथ अपनाता है।।प्रखर देशभक्ति के उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करने वाले डॉ शीश मोहम्मद ब्रिटानिया सरकार की स्वतंत्रता संग्राम में चूले हिला दी।बड़हरवा प्रखंड के काकजोल ग्राम निवासी डॉ शीश मोहम्मद का जन्म 1897 ई में हुआ था।बरहड़वा के शीश मोहम्मद पेशे से डॉक्टर थे। ये निःशुल्क चिकित्सा समाज के लोगों का करते थे। महात्मा गाधी के आदोलन से प्रेरित होकर इन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के मौके पर आजादी का संकल्प लिया था। आगे चलकर इनकी डॉक्टरी का पेशा देश के नौजवानों को आजादी के लिए प्रेरित करने में काम आया। दरअसल, उन दिनों डॉक्टर साहब बैलगाड़ी के सहारे गाव-गाव घूम-घूमकर मरीजों का इलाज किया करते थे। इलाके के हर घर तक उनकी पहुंच होने के कारण उन्होंने नौजवानों के बीच आजादी की मशाल जलाई तथा गाधी के आदोलन में भाग लेने के लिए लोगों को प्रेरित किया। बाद में बड़ी संख्या में नौजवान आजादी की लड़ाई में सामने आए। डॉक्टर साहब ने दिया था नारा -धान धरती किसकी, जोते बोये उसकी ।बरहड़वा कांकजोल निवासी शीश मोहम्मद होम्योपैथ के डॉक्टर थे। उन दिनों उन दिनों अंग्रेजों की दमनकारी नीति चरम पर थी। वे स्थानीय जमींदार के माध्यम से गरीब, किसानों पर शोषण किया करते थे। गांधी से प्रभावित शीश मोहम्मद ने अंग्रेजी सरकार और स्थानीय जमींदार के खिलाफ लोगों को खड़ा करने का किया। मरीज के इलाज और दवादारू देने के बहाने गांव-गांव पहुंचने वाले डॉक्टर साहब ने उन दिनों नारा दिया था। धान धरती किसकी, जोते बोये उसकी। इस नारे से प्रभावित होकर भारी संख्या में बंधुआ मजदूर आंदोलन को प्रेरित हुए थे। हालांकि, उन दिनों अंग्रेजी हुकूमत गांव-गांव में भेदिया खड़ा कर रखे थे ताकि आंदोलन की शुरूआत होते ही उन तक इसकी जानकारी हो जाए। *शिक्षक से डॉक्टर तक शीश महल ने तय की थी दूरी* : डॉक्टर शीश मोहम्मद का जन्म काकजोल गांव में 1897 में हुआ था। वे इब्राहिम शेख इकलौते संतान थे। उनके पिता पेशे से काष्ठ मिस्त्री थे। उन दिनों इलाके के एक मात्र स्कूल चौलिया में हुआ करता था। पाकुड़ से हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण करने के बाद शीश मोहम्मद उन दिनों चौलिया स्कूल में शिक्षक बन गए। कुछ दिन प्राथमिकी शिक्षक के रूप में काम करने के बाद वे त्यागपत्र देकर हाई स्कूल बरहड़वा में बतौर शिक्षक का काम किया। उन दिनों इस स्कूल को समिति चलाती थी। विद्यालय में पढ़ाई के बाद वे कुछ दिनों तक बरहड़वा के निजी अस्पताल में होम्योपैथिक की दवा देने का काम करने लगे। उनके पोता मो आशिफ बताते है कि अंग्रेजों के अत्याचार से आहत वे महात्मा गांधी के आजादी की लड़ाई से जुड़ गए। इस दौरान उसकी दोस्ती अब्दुल बारी, क्यूम अंसारी, विनोदानंद झा के साथ हुई। उन दिनों स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल केजरीवाल के साथ मिलकर उन्होंने विदेशी कपड़ा का बहिष्कार और हरिजनों के बीच चरखा वितरण का काम किया था। हालांकि वर्ष 1965 में डॉक्टर साहब का निधन हो गया। जिसके बाद पिता के याद में बेटे स्व कमील ने डॉक्टर शीश मोहम्मद मेमोरियल समाज कल्याण समिति बनाई।विडंबना तो यह है कि प्रखंड परिसर में डॉ शीश मोहम्मद के शिलापट के अलावे कुछ भी नहीं है ।शीश मोहम्मद के चार पोते बाइक मिस्त्री का कार्य कर अपना जीवन यापन नहीं करते।स्वतंत्रता सेनानी शीश मोहम्मद के नाम पर बड़हरवा प्रखंड में न तो कोई स्मारक बना न ही किसी सड़क का नामकरण हुआ।इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी इस दिशा में उदासीन बने रहे ।बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगरनाथ मिश्रा एवं पूर्व सांसद स्व थामस हांसदा ने गुमानी के उच्च विद्यालय में एक जनसभा में डॉ शीश मोहम्मद के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान का चर्चा अपने भाषण में किए थे।बड़हरवा प्रखंड के किसी चौक चौराहे पर किसी महापुरुष का आदमकद प्रतिमा अभी तक नहीं बना है न ही किसी सड़क का नामकरण किसी राष्ट्रीय महापुरुष के नाम पर हुआ है।राष्ट्र की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले महापुरुष राष्ट्र के मेहराब को सजाने एवं भव्य बनाने के लिए स्वयं नींव का पत्थर बन जाते है।राष्ट्र के सुंदर मेहराब को तो सब देख खुश होते है लेकिन इसके नीचे दबे देह दानी दधिचि का हड्डी किसी को नजर नहीं आती।महापुरुष निज रक्ताजंलि का एक एक कतरा राष्ट्र को समर्पित करते हुए कहते है । *तेरा वैभव अमर रहे मां,हम दिन चार रहे ना थे*




